*आजादी के 70 साल बाद सरकार के शल्‍य चिकित्‍सा पर फैसले ने आयुर्वेद चिकित्‍सा को दी संजीवनी*

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*आजादी के 70 साल बाद सरकार के शल्‍य चिकित्‍सा पर फैसले ने आयुर्वेद चिकित्‍सा को दी संजीवनी*

वाराणसी। केंद्र सरकार की ओर से आयुर्वेद चिकित्‍सकों को सर्जरी के लिए भी अनुमति देकर देश में बड़ी चिकित्‍सा क्रांति का मार्ग प्रशस्‍त किया है। सरकार के फैसले के बाद अब सर्जरी के नाम पर लाखों वसूलने वाले एमबीबीएस डाक्‍टरों पर निर्भरता एक झटके में खत्‍म कर परंपरगत भारतीय आयुर्वेद को बड़ी संजीवनी दी है। सरकार के फैसले के अनुसार अब आयुर्वेद के चिकित्‍सक भी सर्जरी कर सकेंगे।

सरकार के इस फैसले का पांचवें वेद माने जाने वाले आयुर्वेद के भगवान धन्‍वंतरि की नगरी काशी के आयुर्वेदाचार्यों ने स्‍वागत करते हुए सरकार का चिकित्‍सा के क्षेत्र में क्रांतिकारी फैसला करार दिया है। चौकाघाट राजकीय आयुर्वेद चिकित्‍सालय के डाक्‍टर अजय गुप्‍ता के अनुसार सरकार के फैसले के बाद आयुर्वेद चिकित्‍सकों का मनोबल भी बढ़ा है और इसका लाभ आखिरकार आम जनता को भी मिलेगा। अंग्रेजी इलाज में सर्जरी और लाखों फूंकने वाले गरीब लोगों के लिए अब आयुर्वेद अस्‍पताल आर्थिक रूप से सहयोगी साबित होने जा रहा है। आयुर्वेद के महान ऋषि चरक और सुश्रुत के द्वारा प्रतिपादित शल्य चिकित्सा के आठ सिद्धांतों पर आज भी आधुनिक चिकित्‍सा के नाम पर महंगी सर्जरी की जाती है। जबकि आधुनिक चिकित्‍सा के दौर में कोई भी नया सर्जरी का सिद्धांत प्रतिपादित नहींं हो सका है। लिहाजा भारतीय आयुर्वेद की परंपरा में देश आजाद होने के बाद यह पहला मौका है जब आयुर्वेद के चिकित्‍सकों को भी सर्जरी करने की अनु‍मति दे दी गई है।

आयुर्वेदाचार्य डा. अजय गुप्‍ता के अनुसार सुश्रुत ने शल्‍य चिकित्‍सा के बारे में बताया था उसी सिद्धांत पर आज भी सर्जरी की जा रही है। ऐसे में आयुर्वेद के बारे में सबको जानने की जरूरत है। बताया कि जब दुनिया सर्जरी के बारे में जानती भी नही थी, उस काल मे सुश्रुत ने सैकड़ो यंत्रो और शस्त्रों को बनाया और उसके द्वारा शल्‍य चिकित्‍सा की। आज के जो शस्त्र या चिकित्‍सा उपकरण हैं सभी उन्हींं का परिमार्जित रूप हैंं। पहले यह सभी लोहे, सोने और चांदी के बनाये जाते थे अब स्टील या अन्य धातुओं से बनाये जाते हैंं और सर्जरी के सिद्धांत तो बिल्कुल वैसे ही अब तक बरकरार हैं। आयुर्वेद के चिकित्‍सकों को शल्‍य कार्यों से अलग रखा गया है, अब अनुमति मिलने के बाद आयुर्वेद के लाभों के साथ आम आदमी को शल्‍य चिकित्‍सा भी काफी कम कीमतों पर मिलेगी। सरकार के इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ देश की आम जनता को ही मिलेगा।

*सुश्रुत संहिता में दर्ज हैं सर्जरी के तमाम उदाहरण*

शल्य तंत्र विशेषज्ञ डॉ शैलेन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार सुश्रुत संहिता के चिकित्सा स्थान के अध्याय 7 में जहां रेनल स्‍टोन की सर्जरी का प्रमाण मौजूद है तो दूसरी ओर सूत्र स्थान के अध्याय 16 में लोबुलोप्लास्टी और राइनोप्‍लास्‍टी की भी जानकरी दर्ज है। इसी तरह तमाम बीमारियों में जहां शल्‍य चिकित्‍सा (सर्जरी) की जरूरत है उसकी जानकारियां प्राचीन भारतीय चिकित्‍सा में युगों पहले ही रच दी गई थीं। धन्‍वंतरि, सुश्रुत, चरक, सुषेन आदि वैद्यों के अुनुभवों से भारतीय आयुर्वेद चिकित्‍सा समृद्ध होती रही है।

*सुश्रुत संहिता में बताए गए सर्जरी उपकरण*

सुश्रुत सूत्रस्‍थान 7 के अनुसार यंत्र विधिमध्यायम में शल्‍य यंत्रों की कुल संख्या 101 मानी गई है वहीं वाग्भट के अनुसार 116 यंत्र माने गए हैं। सबसे प्रधानतम यंत्र हाथ को माना गया है। जबकि प्रधान नियंत्रक कंकमुख यंत्र यानी ‘कैंची’ जो कौवे की चाेंच की भांति होती है, उसे माना गया है। सुश्रुत सूत्र स्थान मैं यंत्र की परिभाषा को – तत्र मन: शरीराबाधकराणि शल्‍यानि, तेषाम आहरणाेपायो यंत्राणि के रूप में प्रतिपादित किया गया है। यंत्रों के आकृति के भेद के अनुसार यह छह प्रकार बताए गए हैं। जिसने 24 प्रकार के स्वास्तिक यंत्र, दो प्रकार के संंदश यंत्र, दो प्रकार के ताल यंत्र, 20 प्रकार के नाड़ी यंत्र, 28 प्रकार के शलाका यंत्र, जबकि पच्चीस उपयंत्र माने गए हैं। इसके अतिरिक्त आष्टांंहृदय में भी अन्य यंत्र बताए गए हैं, जिनमें संदश यंत्र 4, नाड़ी यंत्र 26, शलाकायंत्र 32 और 29 उप यंत्र बताए गए हैं। यह सभी अमूमन लोहे के बनाए जाने वाले यंत्र थे और लोहे के ना मिलने पर उनके समान ही अन्‍य पदार्थों से भी बनाए गए थे। इसके अलावा शल्य कर्म के लिए 23 प्रकार के शस्त्रों का भी विस्तार से वर्णन किया गया है और इनका प्रयोग किस सर्जरी के लिए करना है इसका भी वर्णन किया गया है।

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