*आनलाइन सुंदर सत्संग का आयोजन पटेश्वर धाम*

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प्रेस हेतु

1 अक्टूबर
प्रतिदिन की भांति आज भी सुंदर ऑनलाइन सत्संग का आयोजन पाटेश्वर धाम के संत श्री राम बालक दास जी द्वारा उनके ऑनलाइन ग्रुप सीता रसोई संचालन समूह में प्रातः 10:00 से 11:00 बजे और दोपहर 1:00 से 2:00 बजे किया गया जिसमें सभी भक्तगण जुड़कर अपनी जिज्ञासाओं को संत श्री के समक्ष प्रस्तुत किये और उनका समाधान प्राप्त किए
सुंदर भजनों और मानस की चौपाइयों से संगीतमय यह सत्संग आज पूरे देश में ज्ञान प्राप्ति का माध्यम बन चुका है, और सभी इस सत्संग से जुड़कर अपने को धन्य कर रहे हैं, आज की सत्संग परिचर्चा में डुबोवती यादव कुनकुरी, संत श्री के समक्ष जिज्ञासा रखी, की ईश्वर सगुण है या निरगुण है परमात्मा साकार है या निराकार है गुरुदेव प्रकाश डालने की कृपा करें इस विषय का समाधान बताते हुए बाबा जी ने कहा कि, यदि आप प्रतिदिन रामचरितमानस का पाठ करेंगे एवं उसका श्रवण करेंगे तो इस प्रश्न का उत्तर आपको स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा, सगुन एवं निर्गुण में कोई भेद नहीं है जो निर्गुण रूप से संसार का पालन करता है उसकी रचना करता है वही सगुण होकर उसकी रक्षा करने भी आते हैं सगुण निर्गुण पर चर्चा बहुत से वेद पुराण उपनिषद भागवत गीता में है लेकिन आजकल कुछ लोग अपना मत थोपने का प्रयत्न करते हैं वे कहते हैं की परमात्मा निराकार है वह पारब्रह्म है और मूर्ति पूजा का विरोध करने लगते हैं इस तरह की विचारधारा को रखने वाले लोग भरम रोग से ग्रस्त हो चुके हैं उन्हें रोग मुक्त करने हेतु किसी वैद्य की आवश्यकता है और यह वैद्य केवल गुरु रूप में प्राप्त किए जा सकते हैं गोस्वामी तुलसीदास जी ऐसे लोगों को धिक्कारते हुए कहते हैं कि जो लोग प्रभु को सगुण रूप में नहीं देख सकते जो माता पिता देवी देवता गौ माता साधु ब्राह्मण और प्रकृति के विभिन्न रूपों में परमात्मा को नहीं देख सकते जो इस सृष्टि के छोटे-छोटे बच्चों के सरल भाव मन में परमात्मा को नहीं देख सकते ऐसे स्वार्थी लोग बात तो जरूर पारब्रह्म की करेंगे लेकिन आवश्यकता होने पर स्वार्थ वश हत्या तक कर देंगे
तो केवल ज्ञान की चर्चा ना कर इस सृष्टि में जो परमात्मा का रूप है उसकी पूजा कीजिए, उसका सम्मान कीजिए
जब निर्गुण ही सगुण बनकर आया है तो आपको निर्गुण की ओर जाने की आवश्यकता ही नहीं है एक समय ऐसा आएगा जब आप सगुण की उपासना करते हुए निर्गुण को ही प्राप्त करेंगे अतः सगुन वाद नहीं यह हमारे जीवन की आवश्यकता है प्रभु के सुंदर रूप का दर्शन करना उनके गुण लीला का गान करना तीर्थों की यात्रा करना उनके नामों का सुमिरन करना यह हमारे जीवन का ध्येय होना चाहिए
सतर राम जी ने जिज्ञासा रखी की,
प्रथमहिं कहहु नाथ मति धीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा।।
बड़ दुख कवन सुख भारी।
सोउ संछेपहि कहहु बिचारी।।
सतर राम जी के इस प्रश्न का उत्तर काक भुशुण्डि जी ने किस प्रकार दिया इस पर प्रकाश डालने की कृपा करेंगे गुरुदेव, रामचरितमानस के उत्तरकांड का यह उस समय का प्रसंग है जब महाराज गरूढ़ जी के द्वारा सप्त प्रसंग कहे गए और काग भुसुण्डी जी ने उत्तर दिए
चुकी रामचरितमानस की रचना ही जीवन के सापेक्ष में की गई है जो हर काल में समकक्ष रखकर देखा जाता है हर कांड हमारे जीवन के एक-एक चरण से जुड़ा है तो यह प्रसंग भी वर्तमान जीवन के सापेक्ष में उद्धृत करते हुए बाबा जी द्वारा बताया गया कि कौन सुख बड़ा है और कौन सा दुख बड़ा सबसे बड़ा सुख क्या है एक तरफ मनुष्य जीवन दुर्लभ है तो आपने मनुष्य तन पाकर प्रकृति में ऐसा क्या योगदान दिया जो कि विशेष हों, पशु पक्षी व प्रकृति में पेड़ पौधे तो कुछ ना कुछ योगदान दे ही रहे हैं अतः मनुष्य तन पाना दुर्लभ नहीं बल्कि उसे पाकर ऐसे कर्म करे कि मनुष्य जीवन को अलंकृत करें उसे धन्य बनाएं यह जरूरी है कि सुर दुर्लभ मानव जीवन जो हम प्राप्त कर रहे हैं उसका इस जीवन में कैसे आनंद प्राप्त कर रहे हैं कुछ लोग पशु जीवन व्यतीत कर रहे हैं सोना उठना खाना कमाना बस यही दिनचर्या है इसे सार्थक कैसे बनाएं यह सोचे तो इसके लिए विवेक की आवश्यकता होती विवेक कैसे प्राप्त होगा विवेक केवल सत्संग से ही प्राप्त किया जा सकता है, अपने दुर्लभ मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने हेतु आप सत्संग के शरण अवश्य ग्रहण करें
प्रकार आज का आनंददायक सत्संग पूर्ण हुआ
जय गौ माता जय गोपाल जय सियाराम

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