*कहाँ गुम हो गये इस गांव के सेकड़ों तालाब* *रिपोर्ट – कैलाश सिंह*

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*कहाँ गुम हो गये इस गांव के सेकड़ों तालाब ?*

– प्राचीन समय में गांव के हर टोले की अपनी संस्कृति और अपना तालाब होता था। या यूं कहें कि तालाब संस्कृति का ही एक हिस्सा हुआ करते थे। हर तालाब का अपना एक नाम और महत्व होता था।

 

एक समय था जब कुशीनगर जनपद के कोटवा ब्लाक केग्राम सभा मड़ार बिन्दवलिया में करीब सौ से अधिक तालाब और पोखरे हुआ करते थे। इस गांव के हर टोले की अपनी संस्कृति और अपना तालाब होता था। या यूं कहें कि तालाब संस्कृति का ही एक
हिस्सा हुआ करते थे। हर तालाब का अपना एक नाम और महत्व होता था। तालाबों के किनारे घनी बंसवारी का जंगल या वृक्षों का घेरा होता था। तालाबों का कैचमेंट यानी जलग्रहण क्षेत्र घने गांव के पास होने से भू-कटाव को रोकने में सहायता मिलती थी और तालाब में गाद भी कम जमा होती थी। जिस कारण तालाब सैकड़ों सालों से विद्यमान रहे। उस दौरान तालाब, कुंए, पोखर आदि वर्षा जल संचय का सफल माध्यम होते थे। इस पानी को पीने और खेती सहित अन्य कामों में लाया जाता था। साथ ही भूजल स्तर को रिचार्ज करने में इनकी अहम भूमिका रहती थी। इस गांव में अभी चालीस साल पहले तक लोग जल संचय और जल संरक्षण को भी संस्कृति का ही अहम हिस्सा और जल संरक्षण को हर व्यक्ति अपना कर्तव्य समझता था। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में तालाबों की संस्कृति ही खत्म हो गई। जिस कारण इस गांव में अब केवल आधा दर्जन तालाब, पोखरी और गड़हियां ही बचे है और जो बच चुके है वो अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्षरत है। आज इस गांव का हर नागरिक स्वच्छ पानी के लिए तरस रहा है।
5 वें माइनर इरीगेशन सेंसस (2013-14) के आंकड़ों पर नजर डाले तो कुशीनगर जनपद के कोटवा ब्लाक के ग्राम सभा मड़ार बिन्दवलिया में पांच दर्जन से अधिक तालाब और पोखरे सरकारी रिकार्ड में दर्ज हैं। शेष लगभग 40 से अधिक तालाब और पोखरियां भूमाफियाओं के द्वारा अबैध कब्जा किए जाने के कारण विलुप्त हो चुके हैं। इन भूमाफियाओं द्वारा इन जलस्रोतों पर अबैध रूप से कब्जा कर इन पर अबैध भवन निर्माण किए जा चुके हैं। इन मकानों का नाम भी इन्हीं तालाबों और पोखरियों के नाम पर ही रखा गया है। इससे यहां आने वाले नए शख्स को तालाब, पोखरी या गड़ही का नाम सुनने से ही प्रतीत होता है कि यहां कोई तालाब, पोखरी या गड़ही रहा होगा। तसदीक करने पर पता चलता है कि यहां कभी तालाब, पोखरी या गड़ही हुआ करता था। अब इस गाँव के तालाबों और गड़हियों की कब्र पर अबैध कब्जा कर कच्चे पक्के मकान बन चुके हैं और इन घरों का संरक्षण तालाब, पोखरी या गड़ही पर कब्जा करने वाले इंसान कर रहे हैं। बेशक, तालाब पर कब्जा करना उस दौरान किसी को नहीं खला होगा, क्योंकि आधुनिकता की दौड़ और गंवई वोट बैंक की राजनीति ने बढ़ती आबादी को आशियाने के लिए जमीन देनी थी। लेकिन इसके दूरगामी परिणाम पर न तो शासन प्रशासन ने ध्यान दिया न तत्कालीन जनप्रतिनिधि ग्राम प्रधानों ने और जनता तो लाभ पाने में व्यस्त ही थी।
जल संरक्षण की इन प्राकृतिक धरोहरों को नुकसान पहुंचाने का खामियाजा ये हुआ कि बरसात का पानी पोखर, कुओं, तालाबों, गड़ही और पोखरियों आदि में संग्रहित होकर भूजल को रिचार्ज करने के बजाए गांव के पूर्वी दक्षिणी छोर पर बहने वाले खेखड़ा नाले तथा उत्तरी पश्चिमी छोर से से होकर छोटी गंडक नदी में जाकर व्यर्थ होने लगा। इससे वर्षा जल को भूमि के अंदर जाने का माध्यम नहीं मिला और भूजल तेजी से कम होने लगा है । तो वहीं भू-जल पर अधिक निर्भर होने के कारण हमने इतना पानी खींच लिया कि आज मड़ार विन्दवलिया के कई टोले जैसे भूड़ा मड़ार, बरई पट्टी, बरवां, खदरहवा टोला, कुट्टी टोला, केरवनियां, नौका टोला, श्रीनगर, छावनी टोला, घाट टोला, मुसहरी, मलाही पट्टी और दुसाधी पट्टी
जैसे टोलों पर भूजल काफी नीचे खिसकने की कगार पर पहुंच गया है। जल गुणवत्ता सूचकांक में जनपद कुशीनगर के 122 गांवों की सूची में ग्राम सभा मड़ार बिन्दवलिया 120 वें पायदान है। दूसरी तरफ आधुनिकता के दौर में बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े स्तर पर गांवो की लाइफ लाइन पोखरियों को कचरे और कबाड़ से भरने की आपाधापी ने आग में घी डालने का काम किया। जिससे इनके आसपास के बांस के झुरमुटों और पौधों के कटान से मिट्टी ढीली पड़ गई है। हल्की बरसात में भी भू-कटाव शुरू हो गया है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान छोटी गंडक नदी के किनारे बसे गांवों जैसे घाट टोला, बड़वां टोला, श्रीनगर और केरवनियां आदि गांवों में हुआ। तमाम बाग बगीचे के पेड़ों के अंधाधुंध कटने से पर्यावरण संतुलन बिगड़ चुका है और गाँव में गर्मी बेतहासा बढ़ी है। गांव की गड़ही को भरने से जल की कमी होने के कारण वनस्पतियों आदि को पर्याप्त नमी और जल नहीं मिल रहा है। इससे उपजाऊ भूमि भी जल की कमी की चपेट में आ रहा है और गांव की करीब 14 प्रतिशत भूमि असिंचित होने के कारण अनुपयोगी भूमि में तब्दील होने की कगार पर है। इस गांव की करीब 60 प्रतिशत जनता को पीने के स्वच्छ जल के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। जिस कारण जनता समय समय पर तत्कालीन ग्राम प्रधानों, ग्राम पंचायत सदस्यों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों, जिला पंचायत सदस्य, विधायक, सांसद और सरकारों को कोसती है। गांव की पोखरी और गड़ही पर हुए अबैध कब्जे से भविष्य में आने वाले इस भीषण समस्या को देखते हुए अभी विन्दवलिया टोला से ग्राम पंचायत सदस्य विकास दूबे और पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य रवीन्द्र दूबे के साथ कई लोग जरूर सक्रिय होकर लोगों को जागरुक करना शुरू भी कर दिया है। नतीजा ये रहा कि गांव के कई टोलों में तालाब निर्माण का कार्य मनरेगा से शुरू हुआ। कई लोगों ने स्वयं के स्तर पर भी तालाबों और पोखरों का निर्माण व सफाई कर जल संरक्षण के लिए प्रयास भी कर रहें है। इन सबके प्रयासों से ग्राम सभा मड़ार बिन्दवलिया में कई तालाब बनाए जा रहें हैं, लेकिन सरकार और शासन की नींद फिर भी नहीं टूट रही है। इस गांव के छावनी टोला निवासी युवा अधिवक्ता और अखिल भारतीय भ्रष्टाचार निरोधक समिति के अध्यक्ष अरूण कुमार पाण्डेय ने
सरकार की नींद तोड़ने के लिए कुछ माह पूर्व ही जलशक्ति मंत्रालय को पत्र भेजकर आवश्यक कार्यवाही करने तथा गांव के जल स्रोतों पर अबैध रूप से कब्जा किए लोगों पर कार्यवाही की मांग करते हुए प्रधानमंत्री तथा मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर अबैध कब्जाधारकों से पोखरी और तालाबों को मुक्त किए जाने की मांग की गई है। देखना यह है कि कागजों में जल मंत्रालय के अंतर्गत जोर-शोर से चल रहा जल संरक्षण का कार्य धरातल पर कितना सफल हो पाता है। क्योंकि इन स्रोतों के मुक्ति का परिणाम ही जल मंत्रालय के सफलता की दास्तान को बयां करेंगे। लेकिन गौर करने वाली वाली बात ये है कि आज भी इस गाँव के हजारों लोग पानी बचाने के प्रति जागरुक नहीं हैं। 40 से 60 प्रतिशत जल किसी न किसी कारण से व्यर्थ हो जाता है। तालाब, पोखरी और छोटी गंडक नदी पर स्थानीय अधिकारियों, भूमाफियाओं और बालू के अबैध खदान करने वालों छुटभैये नेताओं की सांठगांठ से धड़ल्ले से अतिक्रमण हो रहा है। पर्यावरण संरक्षण की दुहाई देने वाले अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के काल में ही विकास के नाम पर पर्यावरण को क्षति पहुंचाई जा रही है। इसलिए पर्यावरण और जल संरक्षण के लिए इस गांव को एक ठोस नीति की आवश्यकता है। नीति केवल फाइलों नहीं बल्कि धरातल पर लागू भी हो और नियम कानून का अनुपालन सभी के लिए समान रूप से हो तथा कथनी और करनी में अंतर न हो। साथ ही जनता पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्य का अनुपालन करे। नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हर इंसान के पास रहने के लिए घर तो होगा और घर में नल भी होगा, लेकिन नल में पानी नहीं होगा। इसलिए अपने भविष्य का निर्धारण हमें स्वयं करना होगा।

– *डाॅ. धनञ्जय मणि त्रिपाठी*

( लेखक परिचय:  डाॅ धनञ्जय मणि त्रिपाठी। जन्म- 06 अगस्त 1978, जनपद कुशीनगर, उत्तर प्रदेश।
शिक्षा- पर्यावरण विज्ञान से एम. एस सी. (स्वर्ण पदक), वनस्पति विज्ञान से पीएच.डी. व बी.एड.। कार्यक्षेत्र- शिक्षा, पत्रकारिता और साहित्य की दुनिया में विगत दो दशकों से कार्यरत। वर्ष 1994 से 2015 तक पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। वर्तमान में बेसिक शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश में शिक्षक है। साहित्यकार के रूप में सक्रिय आपके सैकड़ों कविता, कहानी, फीचर और लेख प्रतिष्ठित अखबारों तथा पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपके कार्यक्रम आकाशवाणी और दूरदर्शन से नियमित प्रसारित होते रहे हैं । )

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