*खबरदार: कैशलेस से डिजिटल गुलामी की दस्तक :बैंकों में अब पैसे निकासी व जमा करने पर भी अच्छा खासा चार्ज लगेगा।*

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*खबरदार: कैशलेस से डिजिटल गुलामी की दस्तक :बैंकों में अब पैसे निकासी व जमा करने पर भी अच्छा खासा चार्ज लगेगा।*

यह नया शुल्क लगाना कैशलेस डिजिटल करेंसी की ओर एक और कदम है। कैशलेस की कहानी को जबरन नोटबन्दी से प्रारंभ किया गया था जिसका सूत्रधार वही अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग माफिया है जो कि फीर जीएसटी और अब कोरोना षड्यन्त्र के भी पीछे है।

भारत की कोई भी राजनीतिक दल एवं शीर्ष नेता, काॅर्पोरेट धराना एवं धनवान शख्सियत, उच्च प्रशासनिक अधिकारी एवं दंडाधिकारी, मीडिया हाउस एवं नामी पत्रकार, ज्ञान-विज्ञान-स्वास्थ्य के प्रसिद्ध संस्थाएं एवं बुद्धिजीवी, खेल एवं सिनेमा जगत के धुरंधर- कोई भी इस बैंकिंग माफिया के पैसे या प्रभाव के गिरफ्त से बाहर नहीं है।

इसी माफिया द्वारा यूएस फेडरल रिजर्व, आरबीआई, वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ और सबका बाप ‘बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटलमेंट’ का स्थापना किया गया था। हर एक देश के केन्द्रीय बैंक इनके नियम कानून और डालर व्यवस्था के मुट्ठी में है। जिस देश की बैंकिंग और मौद्रिक व्यवस्था इनके नियंत्रण में नहीं था उनको इन्होंने खुद 09/11 करवा कर उन सबको अपने मुट्ठी में कर लिया है।

अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग माफिया की सारी व्यवस्था पैसे को हवा में जादुई तरीके से बना लेने पर टिकी है। इस हवा में से तैयार पैसे को हीं हमारी सरकारें देश और विदेश के बैंकों से कर्जा में उठाती है और हमारे टैक्स के पैसों (जो कि हमारे टैक्स का 60% से ज्यादा हिस्सो है) और देश के सम्पत्ति (निजीकरण, प्राकृतिक संसाधनों, शेयर मार्केट और एफआईआई एवं एफडीआई) के माध्यम से चुकाती है। इन्होंने करेंसी के पीछे सोना के आधार को 1933 में हीं खत्म कर दिया था। इसके बाद हीं 1935 में आरबीआई का इन्होंने गठन किया था।

पिछले 150 वर्षो में दुनिया और देश में हर एक प्रमुख घटनाएँ यूँ ही नहीं हुआ है बल्कि चरणबद्ध तरीके से पुरी प्लानिंग के साथ किया गया है। इस दरम्यान केवल हिटलर ने हीं उनको पुरजोर चुनौती दिया था। हिटलर ने जर्मनी को बिना किसी बाहरी नियंत्रण वाला अपना खुद का बिना कर्जे वाला पैसा छापकर महज़ पांच वर्षों में अपने देश को दिवालियापन से बाहर निकालकर दुनिया का सबसे आत्मनिर्भर एवं शक्तिशाली देश बना लिया था। हिटलर ने अपने देश के पैसे का आधार मानव श्रम और कला को बनाया था। हिटलर की इस श्रमवादी व्यवस्था को आज के पूंजीवादी व्यवस्था से हमें तुलना करना होगा।

हिटलर के व्यवस्था की सच्चाई को हम सब से छिपाने के लिए बैंकिंग माफिया ने अपने सारे संसाधनों को झोंककर हिटलर को आधुनिक दुनिया का सबसे बड़ा खलनायक के तौर पर हमारे दिमाग में स्थापित कर दिया गया ताकि हम सब इस मौजूदा करेंसी एवं पैसा बनाने की व्यवस्था को आधुनिक दुनिया का सबसे अच्छा, एकमात्र और आखरी व्यवस्था समझें।

सुभाष चन्द्र बोस को हिटलर ने इस कर्जा मुक्त पैसा बनाने की व्यवस्था के राज़ को साझा किया था जिसके वजह से हीं उन्होंने अपने आजाद हिंद करेंसी और फौज को बहुत कम समय में हीं एक शक्तिशाली पहचान स्थापित करने में सफलता प्राप्त की थी। सुभाष चन्द्र बोस के इसी पहचान और उसके पीछे का हिटलर के पैसे की व्यवस्था के राज़ को बैंकिंग माफिया ने हमारी सरकारों की मदद से हम सबसे छिपा कर रखा है।

नोटबन्दी, जीएसटी और कोरोना, तीनों का मकसद स्थायी आर्थिक मंदी लाना, विकेन्द्रिकृत व्यवस्थाओं और संस्थाओं को दिवालिया घोषित करना एवं कैशलेस डिजिटल व्यवस्था से आखिरी व्यक्ति पर भी पूर्ण नियंत्रण पाना है।

नोट से कोरोना फैलता है कहकर कैश से चलने वाले सारे व्यापार को मंहगा और पाबंदी भरा अगले लौकडाउन में कर दिया जाएगा। अंतिम मकसद कैश लेन-देन पर पूर्ण पाबंदी लगाना है। साथ हीं पहले मोबाइल से डिजिटल लेन-देन और फिर कोवीड वैक्सीन के डिजिटल टैटू/माइक्रोचिप मात्र से हीं लेन-देन के वैधता को स्थापित कर दिया जाएगा।

इस गुलामी की व्यवस्था को सबके उपर लागू करने के लिए हमें कोरोना के नाम पर आगे लगातार लौकडाउन लगाने के बाद मौजूदा सारे आर्थिक व्यवस्था का ठप और दिवालिया हो जाने की घोषणा कर दिया जाएगा। हमें हर महीने रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के नाम पर कुछ डिजिटल पैसा दिया जाएगा जो हम वैक्सीन के डिजिटल टैटू/माइक्रोचिप तकनीक से हीं खर्च कर पाएंगे।

फर्जी परोपकार और देश के साथ हर व्यक्ति का सारा कर्जा माफ करने के बदले हमसे हमारी सारी निजी चल-अचल संपत्ति से मालिकाना हक भी छीन लिया जाएगा और फिर भी हम सबको सौभाग्यशाली और सुखी बताया जाएगा।

क्या हम इस झूठी महामारी के नाम पर सबकुछ गंवा कर सदा के लिए गुलाम बनने को तैयार हैं?

हम सब जीवित हैं पर सोए हुए हैं, हुकमरान की बातों को सच मानकर, हसीन सपनों में खोए हुए हैं।

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