*गोरखपुर – जानिए सन् 1860 ई. में कौन था किस मुहल्ले का मालिक*

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गोरखपुर – जानिए सन् 1860 ई. में कौन था किस मुहल्ले का मालिक

गोरखपुर। मियां साहब इमामबाड़ा के पहले सज्जादानशीन मरहूम सैयद अहमद अली शाह अपनी किताब ‘महबूबुत तवारीख’ में लिखते हैं कि उनके समय में नगर में 52 मुहल्ले एवं चक थे। 36 की तादाद में तालाब थे। कई बाग-बगीचे भी थे। सन् 1860-63 में गोरखपुर नगर के कुछ मुहल्लों तथा उनके मालिकों के नाम इस प्रकार थे। जाफरा बाजार मुहल्ले के मालिक नवाजिश अली थे, उनके साथ एक हिस्सेदार रफीउद्दीन थे, जो इस क्षेत्र का कारोबार देखा करते थे। रफीउद्दीन चक इस्लाम के रईस थे, मगर वह जाफरा बाजार के हिस्सेदार भी थे। मुहल्ला कल्याणपुर के मालिक महाराजा सिंह थे। बिंद टोला की मालकिन अमीरन थीं। फकीरा खान मुहल्ला घोसीपुर के काबिज थे। इस तरह काजीपुर कला पर रईस असगर अली काबिज थे। मुहल्ला बुलाकीपुर के दो हिस्सेदार थे गोपी सहाय और बैजनाथ सिंह। मोहनलालपुर का मुहल्ला शिव गुलाम के पास था। सिधारीपुर में सद्दन पांडेय, दाऊदचक में मुहम्मद शरीफ और इलाहीबाग में जमीदार मजहर अली थे। यहां बतातें चलें कि सिधारीपुर का नाम सैयद आरिफपुर था, जो बाद में बिगड़कर और बदलकर सिधारीपुर पड़ गया। नरसिंहपुर बेनी माधव सिंह के पास था। मुहल्ला निजामपुर जहूर अशरफ की मिल्कियत था। पुराना मिर्जापुर की मिल्कियत हुसैन अली बेग की और हनुमान चक की मिल्कियत राम प्रसाद की थी। गाजी रौजा की जायदाद खुदाबख्श के हाथ में थी। यहां पहले गाजी मियां का मेला लगता था। इसी वजह से इस मुहल्ले का नाम गाजी रौजा पड़ा। खूनीपुर और शेखपुर मुहल्ला हुसैन अली के संरक्षण में था। इसी तरह साहबगंज के मालिक जीवन मल्ल थे। बसंतपुर के मालिकान मीर इमदाद अली, राम प्रसाद, जीवन दास और गुरूबख्श थे। उर्दू बाजार उस समय का सबसे व्यस्तम क्षेत्र था। यह फौज का बाजार था। मुगलकाल में यहां फौज ठहरती थी। यहां शाही जामा मस्जिद मुगलों ने बनवायीं। बादशाह औरंगजेब के पुत्र मुअज्जम शाह जब गोरखपुर आये तो इस नगर का नाम मुअज़्ज़माबाद कर दिया गया। यह शहर करीब सौ साल मुअज़्ज़माबाद के नाम से जाना जाता रहा। यहां का उर्दू बाजार बादशाह जहांगीर के जमाने से आबाद था। बसंतपुर मुहल्ला का नाम राजा बसंत सिंह सतासी के नाम पर पड़ा है। मुहल्ला अस्करगंज प्राचीन मुहल्ला है। अस्कर का अर्थ फौज से है। मुगल काल में यहां अस्तबल हुआ करते थे। फौज की एक टुकड़ी भी यहां रहा करती थी।
मुहल्ला नखास भी प्राचीन है। वास्तव में नखास मुहल्ला ‘नख्खास’ से बना है। मुगल काल में यह मवेशियों का बाजार था। मवेशियों में घोड़े भी शामिल थे। इसके अलावा यहां गुलामों की खरीद फरोख्त भी हुआ करती थी। ‘नख्खास’ का अर्थ ही है, मवेशियों का बाजार, घोड़ों का बाजार और गुलामों का बाजार। मगर इनके अलावा रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुएं भी यहां उपलब्ध थीं। रियाज खैराबादी ने नखास पर मुशतरी नाम की तवायफ का वर्णन अपने अखबार में किया है। रेती चौक क्षेत्र के कुछ फासले से राप्ती नदी का बहाव था। रेत के कारण ही रेती चौक नाम पड़ा। काजीपुर कला में मुगल शासन में न्यायिक व्यवस्था के लिए बड़े काजी की नियुक्ति थी। इसी कारण यह मुहल्ला काजीपुर कलां और बड़े काजीपुर के नाम से मशहूर था। मुहल्ला काजीपुर खुर्द और छोटे काजीपुर में भी न्यायिक व्यवस्था संचालित थी। मुहल्ला मोहद्दीपुर वास्तव में मोईनुद्दीनपुर (उस वक्त के रईस शेख मोईनुद्दीन) नाम से बिगाड़ कर और बदलकर पड़ गया। अलीनगर मुहल्ले में सूफी बुजुर्ग अली बहादुर शाह मुकीम थे। उन्हीं के नाम पर मुहल्ला अलीनगर है। खूनीपुर मुहल्ले में शहीदों की मजारात मौजूद है। यह क्षेत्र गंजे शहीदां के नाम से जाना जाता है। सूफी बुजुर्ग शाह मारूफ के नाम पर मुहल्ला शाहमारूफ मशहूर हुआ। घोषकंपनी ब्रिटिश काल से मशहूर है। मौजूदा घोषकंपनी चौक क्षेत्र में सन् 1919 में घोष एंड कंपनी नाम से अंग्रेजी दवा की कंपनी थी। इसे डा. गोपाल घोष देखते थे। खैर। इसी तरह मुगल काल में मुफ्तीपुर मुहल्ले से फतवा देने के लिए मुफ्ती नियुक्त थे। इसी वजह से यह मुहल्ला मुफ्तीपुर के नाम से मशहूर हो गया। तुर्कमानपुर में मुगल फौज की तुर्क टुकड़ी रहती थीं। इसलिए इस क्षेत्र का नाम तुर्कमानपुर पड़ा। हजरत सैयद रौशन अली अली शाह की इच्छा इमामबाड़ा बनाने की थी। गोरखपुर में उन्हें अपने नाना से दाऊद-चक नामक मुहल्ला विरासत में मिला था। उन्होंने यहां इमामबाड़ा बनवाया। जिस वजह से इस जगह का नाम दाऊद-चक से बदलकर इमामगंज हो गया। मियां साहब की ख्याति की वजह से इसको मियां बाजार के नाम से जाना जाने लगा।
***कुछ और मुहल्लों के बारे में और भी जानें
गोरखपुर का इतिहास आदि से आज तक के लेखक अब्दुर्रहमान गेहूंआ सागरी लिखते हैं कि मुगलों ने गोरखपुर में अपनी पहली फौजी छावनी मोगलहा (बीआरडी मेडिकल कालेज के निकट) बनायी। मुगल फौज की वजह से इस क्षेत्र का नाम मोगलहा या मुगलहा पड़ा। आज भी मोगलहा मौजूद है। चारगांवां में मुगल फौज की घुड़साल (अस्तबल) कायम थीं। मुगलों ने गोरखपुर में तांबे के सिक्के ढ़ालने का टकसाल (लोग बताते हैं कि बसंतपुर के आस-पास था) खोला था। सन् 1675 ई. से 1700 ई. में मुसलमानों के दो बड़े घराने (उंचवां) आबाद हो चुके थे। इस बड़े घराने के बुजुर्ग सैयद कयामुद्दीन थे। खैर। शाहपुर, बशारतपुर, मुगलहा व चारगांवां मुस्लिम बाहुल्य हुआ करते थे। अंग्रेजों के आगमन पर यहां की मुस्लिम आबादी ने अंग्रेजों के विरुद्ध जमकर लड़ाई (सन् 1857 ई. पहली जंगे आजादी) लड़ी। इस लड़ाई में गोरखपुर के नाजिम मोहम्मद हुसैन का साथ देने वालों को अंग्रेजों ने शहीद कर दिया, बाकी बचे परिवारों को फिजी भेज दिया। शाहपुर व बशारतपुर में ईसाई समुदाय को बसा दिया। खैर। गौतमबुद्ध के समय बौद्ध समुदाय ने ‘पिपल्लीपुरम्’ वर्तमान पिपरापुर में पीठ स्थापित की जो बाद में विस्थापित हुई। सन् 1801 ई. में अंग्रेजों ने गोरखपुर को जिला घोषित किया। यहां बाढ़ का प्रकोप रहता था। रोहिनी, राप्ती व रामगढ़ताल एक हो जाते थे। नगर के गोरखनाथ, माधवपुर, डोमिनगढ़ (यहां डोम कटार राजा का शासन था), बसंतपुर, पिपरापुर कुछ और मुहल्ले टीलों पर थे। मुहल्ला उंचवां भी टीले पर बसा था। सभी टीलों को अलग-अलग करते हुए रेती और थवई नाले (अलीनगर में) बहते थे। ये पश्चिम में राप्ती+रोहिणी संगम से चलकर पूर्व में सुमेर सागर, बौलिया कालोनी होते हुए बिछिया रामगढ़ताल से मिलते थे। इनसे व्यापारिक नावें शहर के मध्य साहबगंज, रेती तथा बक्शीपुर तक आती थीं। दीवान बाजार में आज भी थवई नाले के तट पर प्राचीन घाट तथा गोदाम के अवशेष मिल सकते हैं। वहां आज भी मछली कारोबारी अपना व्यवसाय कर रहे हैं और गुजरे जमाने की याद ताजा हो रही है। थवई नाला रेलवे लाइन बनने से पूर्व सुमेर सागर, बौलिया कालोनी होते हुए बिछिया में रामगढ़ताल से मिलता था। बरसात में सभी मिलकर एक हो जाते थे। सन् 1884 ई. में रेलवे लाइन, महराजगंज रोड, कसया रोड, मलानी बांध और हार्बट बांध बन जाने से पूर्वी भाग में रामगढ़ताल का कछार सीमित है। मलोनी बांध (सन् 1906 ई.) बांध बन जाने से नाले नदी से कट गए। रेती और थवई नालों को पक्का नाला बनाने का श्रेय अंग्रेजों को ही है। खैर। गोरखपुर नगर बागों का नगर था। बहुत से मुहल्लों के नाम बागों पर हैं। आम बाग, दशहरी बाग, कौव्वा बाग, रानी बाग, लीची बाग, जमुनहिया बाग आदि। लोगों का मानान है कि मुहल्ला इलाहीबाग का नाम हजरत मखदूम इलाही बख्श के नाम पर इलाहीबाग पड़ा। इलाहीबाग में शाही मस्जिद बादशाह औरंगजेब के शासनकाल की है। हुमायूंपुर का नाम एक बुजुर्ग हजरत हुमायूं खां शहीद के नाम पर पड़ा। जिनकी मजार मकबरे वाली मस्जिद (अंसारी रोड हुमायूंपुर उत्तरी) में है। यहां मस्जिद में शहीदों की कई मजारें हैं।
तिवारीपुर कभी औलिया चक के नाम से मशहूर था। आज भी कागजों में यहीं दर्ज है। शेख सनाउल्लाह उर्फ दादा औलिया रहमतुल्लाह अलैह की वजह से इस क्षेत्र का नाम औलिया चक था। काफी समय तक यहीं नाम चला। बाद में लोगों ने इसे तब्दील कर दिया । बैंक रोड का कागजों में नाम चक जलालपुर है।
***यह भी जानें
तुर्कमानपुर के बारे में इतिहास की किताबों में लिखा है कि 1206 ई. के आस-पास तुर्क गोरखपुर आयें। तुर्कों ने यहां बस्तियां बसायीं। हांसूपुर का नाम चीनी यात्री फाह्यान व हेनसांग ने ‘हंस-क्षेत्र’ रखा जो बाद में हांसूपुर में बदल गया। साहबगंज का पुराना नाम साहूगंज था। जिसे अंग्रेजों ने बदलकर साहबगंज किया। मुस्लिम शासक बहराम मसऊद ने बहरामपुर बसाया। 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुगलों ने अलीनगर, जाफरा बाजार व नियामत चक बसाया। सिविल लाइन 01 को मुगल बादशाह के फौजदार मिर्जा कमरुद्दीन ने बसाया। मुगलशासन काल में न्याय हेतु 2 काजी, 1 मुफ्ती, जमीनी बंदोबस्त के लिए 1 दीवान, चुंगी वसूली के लिए 1 बख्शी, सरकारी कोष रखने के लिए 1 करोड़ी नियुक्त होते थे। उक्त लोगों के नाम की वजह से जहां वह रहते थे काजीपुर, मुफ्तीपुर, दीवान बाजार व बख्शीपुर मुहल्ला मशहूर हुआ। हुमायूंपुर के बारे में एक तथ्य यह भी मिला है कि इसे अकबर के सेनापति फिदाई खां ने मुगल सम्राट ‘हुमायूं’ के नाम पर हुमायूंपुर बसाया। बादशाह औरंगजेब के पुत्र मुअज्जम शाह ने धम्माल, अस्करगंज, शेखपुर, नखास बसाया और रेती पर पुल (उस वक्त राप्ती नदी पर) बनवाया। शाही जामा मस्जिद उर्दू बाजार भी बनवायीं। बेतियाहाता बेतिया रियासत की वजह से मशहूर हुआ। पांडेय हाता जय नारायण पांडेय की वजह से मशहूर हुआ। यहीं अफगान हाता है जो बहुत मशहूर है। मोहल्ला धम्माल के पास मीर शिकार मुहल्ला है जो शिकारियों के लिए मशहूर था। अब इसे मिसकार टोला कहते हैं। यहां अब भी परिंदे व पालतू जानवर फरोख्त होते हैं। हजरत मोहम्मद अली बहादुर शाह अलैहिर्रहमां बहुत बड़े बुजुर्ग गुजरे है। आपने मुहल्ला रहमतनगर बसाया। हजरत इस्माईल शाह अलैहिर्रहमां के नाम पर मुहल्ला इस्माईलपुर बसा। आपकी मजार काजी जी की मस्जिद इस्माईलपुर के निकट है। मुसलमान सूबेदारों ने रसूलपुर व पुराना गोरखपुर कदीमी मुहल्ला आबाद किया। इस क्षेत्र में कई शाही मस्जिद है। गोरखपुर का इतिहास आदि से आज तक के लेखक अब्दुर्रहमान लिखते है कि सन् 1206 ई. में तुर्क सेनापति बख्तियार खिलाजी तथा इख्तियार खिलजी ने दो राज्यों के विजय के बाद गोरखपुर में कुछ सैनिकों को बसाया। गोरखपुर नगर में स्थापित मुहल्ले बख्तियार व तुर्कमानपुर का बसाव इसी काल खंड में प्रतीत होता है।

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