*यज्ञों से सूक्ष्म वातावरण का संशोधन एवं जनमानस का परिष्कार गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ— ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्*

0
13

यज्ञों से सूक्ष्म वातावरण का संशोधन एवं जनमानस का परिष्कार
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

लंका-दहन के पश्चात् राक्षस तो मारे गये, लेकिन वातावरण ज्यों का त्यों गंदा बना रहा। वातावरण में राक्षसपन बराबर बना हुआ था। फिर उसका निवारण कैसे हो? वातावरण का मुकाबला कैसे किया जाए? तो रामचन्द्र जी ने दस अश्वमेध यज्ञ किये थे। दशाश्वमेध घाट, कभी आप बनारस जाएँ तो वहाँ देखें कि वहाँ घाट का नाम ‘दशाश्वमेध घाट’ रखा गया है।

कौरवों के जमाने में कंस से लेकर के जरासन्ध तब जो अत्याचार कर रहे थे, वे महाभारत में मारे तो गये, लेकिन वातावरण वैसा ही गंदा बना रहा और वैसे ही उसमें दुष्टता भरी रही। उसका शमन कैसे हो? इसका एक ही उपाय भगवान कृष्ण ने बताया कि इसके लिए यज्ञ करना चाहिए। राजसूय यज्ञ उसी समय हुआ था और उसका उद्देश्य था—वातावरण का संशोधन।

वातावरण दिखायी नहीं पड़ता, पर उसका प्रभाव ऐसा बुरा होता है कि चारों ओर हाहाकार फैल जाता है। आज भी वातावरण वैसा ही दूषित है, जैसा कि दो घटनाएँ मैंने सुनायी जो उस समय था। आज भी चारों ओर अशांति फैली हुई है। सारे विश्व में वातावरण की वजह से दुर्घटनाएँ बराबर हो रही हैं। कहीं सूखा पड़ रहा है? कहीं पानी बरस रहा है। कहीं बाढ़ आ रही है, कहीं बीमारियाँ फैल रहीं हैं। ये तो यहाँ हैं, सारे संसार भर में देखिये, लड़ाई का वातावरण बन रहा है। जगह-जगह युद्ध चल रहे हैं, जगह-जगह द्वेष हो रहे हैं, जगह-जगह मार-धाड़ हो रही है, मार-काट हो रही है और आतंकवाद फैला हुआ है। बहुत-सी बातें हो रही हैं। ये कैसे हो रही हैंं? ये वातावरण के दूषित होने की वजह से हो रही हैं। इसकी प्रेरणा वातावरण से मिलती है। वातावरण से प्रकृति भी नाराज है, आज प्रकृति भी हमारा संग नहीं दे रही है। फसल ठीक तरह से पैदा नहीं हो रही। मनुष्यों में जो शांति और चैन होना चाहिए, वह भी नहीं मिल रहा है।

क्या उपाय करना चाहिए वातावरण संशोधन करने के लिए? वायुमंडल भी दूषित है। वातावरण ही नहीं, वायुमंडल भी। कैसे? ये कारखाने चलते हैं, मिलें चलती हैं। इनका धुँआ निकलता है। इन धुओं की वजह से वायुमंडल भी दूषित हो रहा है। एटमबमों का जो परीक्षण चल रहा है, उसकी वजह से विकिरण फैल रहा है और विकिरण की वजह से संतानें खराब हो रही हैं। बुरे स्वभाव की हो रही हैं। अंधी-पंगी हो रही हैं। वातावरण का प्रभाव, वायुमंडल का प्रभाव, विकिरण का प्रभाव सारे संसार भर में छाया हुआ है। इसका क्या उपाय करना चाहिए? ये पुस्तकीय उपायों से काम नहीं चल सकता। इसके लिए तीर-तलवार काम नहीं दे सकते। मनुष्य का सांसारिक पुरुषार्थ काम नहीं दे सकता है। इसके लिए आध्यात्मिक पुरुषार्थ ही कारगर हो सकता है। आध्यात्मिक पुरुषार्थों में यज्ञ की बड़ी महत्ता बतायी गयी है। यज्ञ की ऋषियों ने बड़ी महत्ता गायी है। यज्ञ को पिता बताया गया है और गायत्री को माँ बताया गया है। गायत्री और यज्ञ मिलकर के माता-पिता होते हैं। गायत्री यज्ञों से वह शक्ति पैदा होती है, जो कि नया दृश्य पैदा कर सके और वातावरण में जो गंदगी भरी पड़ी है उसको झाड़-बुहारकर साफ कर सके। यह सफाई करने की शक्ति केवल यज्ञ में है। यज्ञ से आप सारे संसार भर की सेवा कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here