*सत्संग सुधा* प्रकरण― *विचारों का संयम-०४* (पृष्ठ ५३ से ५५)*

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. *🌷।।श्री हरि ।।🌷*
*सत्संग सुधा*
प्रकरण―
*विचारों का संयम-०४* (पृष्ठ ५३ से ५५)

पूर्व से … *इसलिए आज जब कि सर्वत्र दु:ख अशांति बढ़ रही है, घृणा द्वेषमूलक घटनाओंकी संख्या बढ़ती जा रही है, ऐसे समयमें हमें अपने विचारोंके संयमकी अत्यधिक आवश्यकता है। अन्यथा हम घर बैठे-बैठे अखबारोंको पढ़-पढ़ कर, रास्ते चलते हुए किसी घटनाको देख-सुनकर अलक्षित अपराध करते रहेंगे, जिसका परिणाम हमारे लिए, विश्वके लिए और भी अत्यंत भयावह होगा। ऐसा ना हो, इसके लिए हमारे मन में असद्विचार उत्पन्न होनेकी संभावना ही ना रहे, निरंतर परम शुभसे मन पूर्ण रहे, ऐसी स्थिति हमें उत्पन्न करनी पड़ेगी।*

*यों तो इसके लिए मनीषियोंने अनेक उपाय बताए हैं, पर सर्वोत्तम उपाय है, अपने मनसे जगतकी कल्पनाको ही मिटा देना तथा जगतके स्थानपर सदा-सर्वत्र एकमात्र आनंदमय प्रभुकी सत्ताके ही दर्शन करना। यह हुआ कि फिर असद्विचारकी जड़ ही कट जाएगी। सर्वत्र भगवद्भाव हो जानेपर जानमें, अनजानमें कभी किसी प्रकारका अपराध हमसे घट नहीं सकता। हमारे द्वारा जो अशुभका विस्तार होता है, अशुभको प्रेरणा मिलती है, वह फिर होनेकी ही नहीं। फिर तो परम शुभ प्रभुमें प्रतिष्ठित होकर हम सदा सबमें शुभका ही वितरण करते रहेंगे।*

*वास्तवमें सच्ची बात भी यही है कि जहां हमें जगत दीखता है वहां सर्वदा-सर्वदा प्रभु-ही-प्रभु भरे हैं, उनके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। पर हमें ठीक-ठीक ऐसी ही अनुभूति हो तब काम बने। इस अनुभूतिके लिए यह आवश्यक नहीं कि हम खूब पढ़े-लिखे हों। दर्शनशास्त्रका हमारा गंभीर अध्ययन हो, कई कलाओंके मर्मज्ञ हों, अमुक देशके वासी और अमुक वर्ण-जातिके ही हों। इसके लिए तो आवश्यकता इतनी ही है कि एक तो हमारा इस सिद्धांतपर सरल विश्वास हो, हमारी बुद्धि इसको असंदिग्ध और निश्चित रूप से स्वीकार करती हो कि एकमात्र प्रभु ही सर्वत्र अवस्थित हैं और दूसरी बात यह है कि हम इस भावकी बार-बार आदरपूर्वक, अधिक से अधिक आवृत्ति करते रहें। लगनपूर्वक की हुई आवृत्ति कुछ ही दिनोंमें हमारी बुद्धिके निश्चयको मनमें उतार देगी तथा प्रयत्न जारी रहने पर इंद्रियोंको भी इस सत्यकी अनुभूति होते देर नहीं लगेगी। किंतु प्रयत्न हो तब न ? यहां तो _‘कुएँ भांग पड़ी’_ की कहावत चरितार्थ हो रही है। आज समष्टिकी ही प्रवृत्ति प्राय: प्रभुको भूले रहने की बन गई है। हम अधिकांश ऐसे बन गए हैं कि आनंदस्वरूप प्रभुको भूलकर सुख पानेकी लालसासे दिन-रात जागतिक विषयोंके, जो अनित्य और दु:खमय हैं पीछे ही दौड़ते रहते हैं, इससे सुख तो हमें कभी मिलता नहीं, पद-पदपर दु:ख मिलता है, अच्छी तरह जान लेते हैं कि उनसे सुख मिलने का नहीं, पर जानकर भी नहीं जान पाते। उन्हें छोड़ना तो दूर उत्तरोत्तर उन्हींमें उलझते जाते हैं।* आगे है ….

*― एक साधू (पूज्य श्री राधाबाबा)*
सत्संग-सुधा, गीताप्रेस प्रकाशन, कोड 386

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